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परिपक्व कहे जाने वाले या माने जाने वाले लोकतंत्र की हथेली पर बैठी बेहाल नारी पांचों उंगलियों पर दया दृष्टि डाल रही थी। किसी में उसे परेशान जनता नज़र आ रही थी, तो किसी में मीडिया। बाकी उंगलियों में उसे लोकतंत्र की स्तंभ​ कही जाने वाली विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नज़र आ रही थी, परेशान और भौचक्की सी।

“हे भारतीय नारी, क्षमा प्रार्थी हूं। समानता, सबलता, सशक्तिकरण करने के तमाम प्रयासों के बावजूद हम तेरी आबरू नहीं बचा पा रहे!” सभी की उदास, रोती सी शक्लें यही बयां कर रहीं थीं।

नारी ने बारी-बारी से सबकी शर्मिन्दगी को अपनी आंखों से नापा। एक लम्बी सी आह के साथ वह बोल पड़ी- “जिस देश में मुझे महान कहा जाता है, पूजा जाता है, वहां ही ऐसा है, तो कोई तो कसूर मेरा भी है!”

“नहीं, नहीं, तुम्हारा नहीं! सारा कसूर मेरा है !” मध्यमा में उपस्थित मीडिया ने कहा।

“नहीं, तुम नहीं, हम ज़िम्मेदार हैं तुम्हारी दिशा और दशा के लिए!” बायीं तरफ़ की उंगली पर उपस्थित जनता ने मीडिया से कहा।”

लोकतंत्र के तीनों स्तंभ रूपी शेष उंगलियां अंगूठे सहित कभी जनता की और देखने लगीं, तो कभी मीडिया की ओर।

“नहीं, नहीं, तुम लोगों का कोई कसूर नहीं, हम ही कहीं न कहीं ग़लती पर हैं!” तीनों ने एक स्वर में कहा।

नारी पुनः उन बेबस पांचों को बारी-बारी से घूरने लगी।

“शायद तुम में से कोई दोषी नहीं! मैंने ही अपनी लक्ष्मण रेखा लांघी है प्रकृति और धर्म की बनाई हुई!”

लोकतंत्र की हथेली पर अब वे पांचों स्तंभ भी अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा देख रहे थे।

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One thought on “‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते…तत्र..!’

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